दुनियां में अगर कुछ भी स्थायी है,तो वह है परिवर्तन | परिवर्तन अवश्यम्भावी है क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है।संसार में कुछ भी अपरिवर्तनशील नहीं है। सब कुछ नश्वर और क्षणभंगुर है। अथार्थ संसार में कोई भी पदार्थ नहीं जो स्थिर रहता है। उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन सदैव होता रहता है।जीवन हमेशा एक-सा नहीं रहता। परिवर्तन को स्वीकार कर के ही हम अपनी हताशा और निराशा से उबर सकते हैं | समय के साथ चलकर अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं | जो परिवर्तन और अनिवार्यता को समझता है, वस्तुत: ज्ञानी वही है।

               सुख़ के दिनों में हमे यह नही भूलना चाहिये कि दिन के बाद रात ही आती है और रात के बाद दिन ही आना ही  है | मौसम बदलते हैं। हम प्रकृति के इस नियम को जब भी मानने से इनकार करने लगते हैं, तब हम दुखी होकर, परेशानीयों और चिन्ताओ में  घिर जाते हैं।  “जब अच्छे दिन स्थायी नहीं रहते है तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे”, इस सत्य को जानने वाला कभी निराश-हताश नही होता,वरण उसका कर्मशील जीवन ओर मजबूत होकर सामने आता है। सच तो यह है कि परिवर्तन को स्वीकारना ही हमें गतिशील बना सकता है। हम समय रूपी ऐसे वाहन के साथ-साथ चल रहे हैं, जिसमें रुकने का मतलब पिछड़ जाना होता है। जीवन के सफर का वास्तविक आनंद हम तभी उठा सकते हैं, जब हम समय के साथ चलें, पुराने स्टेशनों (जड़ रीति-रिवाजों और पुरानी अवधारणाओं) को छोड़ते जाएं और नए स्टेशनों (समय के अनुकूल नवीनता) को अपनाते जाएं।  समय के साथ किसी भी वस्तु, विषय और विचार में बदलाव आते  है। मनुष्य की स्थितियां एवं मनोस्थितियां बदलती हैं। समय के साथ-साथ बदलने को ही विकास कहा जाता है। परिवर्तन से मुंह मोड़ने से हमारा विकास नहीं हो सकेगा । बहता जल हमेशा ताजा रहता है, बहते हुये कभी नही सड़ता है |

यदि हमारे व्यक्तित्व  में निरंतरता एवं नयापन को बनाए रखना चाहते हैं तो हमें अपने आचार-व्यवहार को परिवर्तनोन्मुख बनाना ही होगा। तभी हमारी प्रगति संभव है। इसके विपरीत, यदि हम परिवर्तन को स्वीकार नहीं करते, तो हम रूढि़वादी हो जाते हैं।  परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करने वाला वर्तमान की परिवर्तनशील दुनियां में आगे बढने की राह में स्वयं ही रुकावट बन जाता है और अंदर ही अंदर दुखी होकर स्वयं को जलाता हैं।

परिवर्तन को स्वीकारना साहस का काम है। क्योंकि इसके लिए गतिशील-कर्मशील और सकारात्मक बनकर ही जीवन में आई मुश्किलों से संघर्ष किया जा सकता है । संघर्ष ही हमारे जीवन में विकास के बीज बोता है। एक लोक कथा है। एक बार एक किसान भगवान से नाराज हो गया कि वे कभी बारिश-ओले से फसल चौपट कर देते हैं, तो कभी तूफान से। उसने भगवान से प्रकृति का संचालन एक साल के लिए अपने हाथ में ले लिया। उसकी फसलों के लिए जितनी जरूरत थी, किसान ने उतना पानी बरसाया। तूफान आने नहीं दिया। जब धूप की जरूरत हुई तो सूरज चमका दिया। उसने फसल के हर खतरे को रोक दिया। सचमुच गेहूं की फसल बहुत अच्छी हुई। बड़ी-बड़ी बालियां लग गईं, लेकिन जब फसल काटी गई, तो पता चला कि बालियों के अंदर गेहूं के दाने तो थे ही नहीं। फिर किसान भगवान से बोला, ‘भगवन, यह आपने क्या किया।’ भगवान ने कहा, ‘जो किया, तुमने ही किया। बालियों में बीज इसलिए नहीं आए, क्योंकि पौधों को तुमने चुनौती दी ही नहीं। उनके पास कोई संकट नहीं था। गेहूं के पौधे संघर्ष की अपनी ताकत खो चुके थे। ऐसे में उनकी सृजनात्मकता भी खो चुकी थी।’जीवन का स्वाद इसी तरह हमारे जीवन में जो विपरीत परिस्थितियां आती हैं, वे ही हमारे विकास और सृजनात्मकता में सहायक बनती हैं। बस, हमें धर्य के साथ उनसे संघर्ष करना चाहिए। जीवन में दुख और सुख दोनों ही आते हैं। इसलिए जीवन में आए परिवर्तनों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करते हुये जीवन को आनन्दित बनाया जा सकता है |

हमारे चारो ओर ऐसे कई उदाहरण जो किसी समय में अत्यधिक लोकप्रिय रहे लेकिन समय के साथ परिवर्तन को स्वीकार नही करने के कारण वर्तमान में अपना अस्तित्व खो चुके है | आकाशवाणी के सीलोन स्टेशन से प्रत्येक बुधवार को बिनाका/सिबाका का गीतमाला और रोज़ाना विविध भारती और आल – इंडिया रेडियो के कार्यक्रम सुनने का बेसब्री से इंतजार रहता था | परिवर्तन के साथ कुछ समय बाद शटर वाले ब्लैक-वाइट टी.वी. ने हमारे घरो की शान बढाई | चित्रहार,नुक्कड़,ये जो है जिन्दगी, रामायण ,महाभारत आदि सीरियलों और फिल्मो के साथ दूरदर्शन के अन्य कार्यक्रम देखने के लिये उत्साह देखते बनता था | अब परिवर्तन के कारण ये सब यादे बनकर रह गये है | टाटा के ओके ,हमाम,लिरिल साबुन से नहाना और सनलाइट साबुन से कपड़े धोना शान की बात थी ,लेकिन इन उत्पादों ने समय के साथ परिवर्तन नही किया और लुप्त हो गये और समय के साथ परिवर्तन करने के कारण इनकी जगह लक्स, रिन,निरमा आदि ने ले ली है |

जीवन को बहते हुए पानी की तरह बनाया जाए क्योंकि बहते पानी में सदा ताजगी एवं ऊर्जा बनी रहती है। इंसान हो या व्यापार, वस्तु हो या सेवा, सभी को सदा आगे बढ़ना है और यात्रा करनी है, मंजिल तक पहुंचना है,तो कदमो और भावनाओं के मोह को त्यागना होगा | जीवन से जुड़ीं पुरानी भावनाओ,आदतों को हटाना होगा या उनमे परिवर्तन करना होगा,वरना अस्तित्व लुप्त या समाप्त होकर, पुरानी यादे बनकर रह जायेगा |

3 Thoughts to “परिवर्तन जीवन का आधार …..!”

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