हर मनुष्य का अलग-अलग व्यक्तित्व होता है, वही उसकी पहचान भी है। कोटि-कोटि मनु्ष्यों की भीड़ में भी वह अपने निराले व्यक्तित्व के कारण पहचान लिया जाता है । यही उसकी विशेषता भी है और व्यक्तित्व भी । प्रकृति का यह नियम है कि एक मनुष्य की आकृति दूसरे से भिन्न है। यह जन्मजात भेद आकृति तक ही सीमित नहीं है अपितु उसके स्वभाव, संस्कार और उसकी प्रवृत्तियों में भी वही असमानता समाहित रहती है। इस असमानता में ही न केवल सृष्टि अपितु परिवार और समाज का सौन्दर्य भी समाहित है। प्रकृति हर पल अपने को नये रूप में सजाती है।लेकिन मनुष्य इस प्रतिपल होनेवाले परिवर्तन को उसी रूप में नहीं देख सकता है | क्योंकि मनुष्य-चरित्र को परखना  बड़ा  कठिन कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं है। कठिन केवल इसलिए नहीं है कि उसमें विविध तत्त्वों का मिश्रण है बल्कि इसलिए भी है कि नित्य नई परिस्थितियों के आघात-प्रतिघात से वह बदलता रहता है। वह चेतन वस्तु है एवं परिवर्तन उसका स्वभाव है।

             मानव समाज में मानव के कई प्रकार के रूप दिखाई देते हैं। एक समान से रूप-रंग और काया होने के बावजूद भी गुण, कर्म स्वभाव का अंतर ही मानव को अपनी एक अलग पहचान बना देता है। मानवीय मूल्यों की अवहेलना कर विपरीत रास्ते को अंगीकार करने वाले मानव को सभ्य समाज घृणा की नजर से देखता है तथा जो मानव साँस्कृतिक एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति पर चलते है उन्हें एक आदर्श एवं परिपक्व मानव के रूप में सराहा जाता  हैं। साधारणतया यह जिज्ञासा प्रत्येक के मन में बराबर बनी रही है कि आदर्श एवं परिपक्व व्यक्ति की पहचान एवं उसके सही लक्षण क्या हैं?

             मानव के व्यक्तिगत जीवन,परिवार एवं समाज में सुख-शाँति की परिस्थितियां किस आधार पर बनेंगी ? इस प्रश्न का संक्षिप्त में सारगर्भित जवाब होगा “मानव में मानवता के विकास से”। इसी को अप्रत्यक्ष रूप से मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का तात्पर्य मात्र शारीरिक स्वस्थता,आर्थिक सम्पन्नता एवं बौद्धिक प्रखरता के संगम को मानना भूल होगी। वास्तव में इसका सही एवं यथार्त स्वरूप सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को व्यक्तित्व में न केवल अंगीकार करना अपितु समय-समय पर विकसित करना भी है।

           इस संदर्भ में प्रसिद्ध लेखकों समाजविदो ने इस प्रकार परिभाषित किया है :-

  • ”व्यक्ति की परिपक्वता, अपने गुणों के विस्तार एवं कमियों को खुले दृष्टिकोण से स्वीकार कर सुधारने की वृत्ति के साथ आती है। ” एक परिपक्व व्यक्ति के जीवन दर्शन में एकरूपता का समावेश होता है। उसके अंतर्मन में मानव मात्र के कल्याण की भावना विकसित होती है, जिसके आधार पर वह समता, सौहार्द, सहयोग तथा मैत्री पूर्ण व्यवहार करता दिखाई देता है। प्रो.जी. डब्लू. आलपोर्ट

–  “हर व्यक्ति आत्म सिद्धि प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। यही उसकी समस्त क्रियाओं की अभिप्रेरणा है। किन्तु जब तक व्यक्ति अपने में सादगी, शालीनता, सच्चरित्रता जैसे आध्यात्मिक गुणों का विकास नहीं कर लेता उसके व्यक्तित्व में परिपक्वता और सर्वांगीण उन्नति नहीं आती।“  अब्राहम एच.मैसलो (“टुवार्डस ए साइकोलॉजी ऑफ बीइंग“ )

अक्सर बाहरी सुन्दरता को अच्छा व्यक्तित्व समझ लिया जाता है लेकिन, सिर्फ सूरत ही नहीं बल्कि सीरत अच्छे व्यक्तित्व के लिए ज्यादा जरूरी होता है | कुछ लोग बहुत सुन्दर दिखते हैं लेकिन हमारे मन पर अपना गहरा प्रभाव नहीं छोड़ते वहीँ कुछ लोग दिखते तो बहुत साधारण से हैं मगर हमारे मन पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं | चेहरे पर मधुर मुस्कान,व्यवहार में शिष्टाचार और बातचीत करने का सलीका हमारे व्यक्तित्व की एक ख़ास पहचान बनाता है | हर इंसान में कुछ-न-कुछ खासियत होती है, जरूरत इस बात की होती है कि उसे कैसे निखारा जाये | सबसे पहले खुद पर ध्यान केन्द्रित करें, अपनी कमियों को इस तरह ढूंढें जैसे अपने शत्रु को ढूंढ रहे हों और उन्हें दूर करने का प्रयास करें | अपनी पहचान वही लोग बना पाते हैं जो खुद को अच्छी तरह पहचानते हैं |
खूबसूरत व्यक्तित्व आपके सकारात्मक सोंच पर निर्भर करती हैं जिन्दगी में सकारात्मक और अच्छी बातों को जगह दें और उन बातों को अपनी जिन्दगी से निकाल दें जो तकलीफ देते हैं | तनाव एक नकारात्मक विचार से शुरू होता है, इन पर दृढ इच्छाशक्ति से काबू पाया जा सकता है | जब अक्सर तनाव और निराशा महसूस हो उन पुरानी वस्तुओं को जिनसे हमारी भावनाएं बंधी होती हैं और वर्तमान समय में जिनकी कोई जरूरत नहीं होती उन्हें हटा देना अच्छा है | ठीक इसी तरह हमें किसी की कही कोई बात चुभ जाए तो सालों उस बात को अपने दिल से लगाये रखते हैं | ऐसा नहीं करना चाहिए उन बातों को अपने मन से निकाल दें, नयी चीजों और नए विचारों को जगह दें |
  आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी दृष्टि को सीमित तथा क्षणिक स्वार्थों से हटायें, अहंकार की बेड़ियों को तोड़ें और स्नेह-सौजन्य स्वार्थ रहितता के आधार पर कुटुम्बकम् की भावना को स्वीकार करें। हमारा यह छोटा कदम ही आगे चलकर व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होता है और इसी के सहारे परिवार,समाज और जगत में सुख-शाँति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है जो वर्तमान में समय की माँग भी यही है।                                 

  

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